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कोई न किसी को द्रोही कहे

कोई न किसी को द्रोही कहे
हमारा तिरंगा गगन में यूं ही,
अपनी मस्ती में लहराता रहे।
आलोचना पर किसी की,
कोई न किसी को द्रोही कहे।
सत्ता और दल न देश हैं,
देश कहने को बातें शेष हैं।
मत मिटाइये यारों नशे में,
देश की गढ़ी परिभाषा को ।
मत कुचलिये कुचक्रों से,
जन मानस की आशा को।
सत्ता शक्ति केवल खेल है,
यह समय के बस घालमेल हैं।
जो कल था आज वह है नहीं,
जो आज है कल होगा नहीं।
जगत में कोई ऐसा प्राणी नहीं,
जिसने आज को भोगा नहीं।।
– हरी राम यादव
बनघुसरा, अयोध्या
7087815074




