वीरगति दिवस विशेष

वीरगति दिवस विशेष
सैपर शहजाद खान शौर्य चक्र (मरणोपरान्त)
भारतीय सेना और सीमा सड़क संगठन के जवान ज्यादातर विषम परिस्थितियों में काम करते हैं जहाँ पर हर पल उनके जीवन को खतरा होता है। सैनिकों को दुश्मन के साथ साथ प्राकृतिक चुनौतियों से भी जूझना पड़ता है। जहाँ एक और विषम परिस्थितियां होती हैं और दूसरी और होता है कर्तव्य । सैनिक हमेशा अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देते है, चाहे उसके लिए उन्हें कोई भी कीमत चुकानी पड़े । वीरता केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों में भी दिखाई देती है जहाँ पर सैनिक उन प्राकृतिक बाधाओं से दो चार होते हैं।
जम्मू-कश्मीर में सर्दियों का मौसम सैलानियों के लिए बढ़िया होता है लेकिन सरहद पर खड़े जवानों के लिए ख़तरनाक होता है। सर्दी के बाद का मौसम तो उससे भी खतरनाक होता है , जब बर्फ पिघलना शुरू होती है | बर्फ पिघलने के साथ ही साथ बर्फ की चट्टानों के खिसकने का हमेशा डर बना रहता है| 20 अप्रैल 1993 को एक ऐसी ही घटना हुई जिसमें एक परिवार का सहारा छिन गया।
सेना इंजीनियर्स कोर के सैपर शहजाद खान डोजर ऑपरेटर के पद पर तैनात थे । 20 अप्रैल का दिन था, पहाड़ की ठंडी हवा शरीर में कांटे चुभो रही थी । चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी। सड़कें बर्फ से पटी थीं । सैपर शहजाद खान को 17,582 फीट की ऊंचाई पर स्थित तंगलांग ला के पास उपशी-सरचु रोड पर बर्फ हटाने के लिए तैनात किया गया था। सैपर शहजाद खान बड़ी ही तन्मयता से बर्फ हटा रहे थे ताकि बंद आवागमन शुरू हो सके। बर्फ हटाते समय उनका डोजर घाटी की ओर खिसकने लगा। सैपर शहजाद खान ने साहस और कौशल का परिचय देते हुए डोजर को नियंत्रण में कर लिया और खुद के अलावा अपने दो सहयोगियों को बचाने में वह सफल रहे।
उसी सड़क पर एक अन्य स्थान पर सैपर शहजाद खान को 40 फीट बर्फ जमी हुई दिखाई दी। यद्यपि वह सड़क के किनारे लटकी हुई बर्फ को हटाना गंभीर जोखिम था, वह गहरी खाई में गिर सकते थे । उन्होंने इस बर्फ को हटाने का निश्चय किया। थोड़ी सी जमी हुई बर्फ हटाने के बाद डोजर बर्फ पर फिसलने लगा और वह पलटने की स्थिति में हो गया। सैपर शहजाद खान के पास डोजर से बाहर निकलने का मौका था, लेकिन उन्होंने मूल्यवान मशीन को बचाने के दृढ़ संकल्प के साथ डोजर पर नियंत्रण नहीं छोड़ा। दुर्भाग्य से सैपर शहजाद खान डोजर से नीचे गिर गए और डोजर के नीचे दब कर अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये। सैपर शहजाद खान को उनके साहसिक निर्णय, कर्तव्यपरायणता, दायित्व निर्वहन की सर्वोच्च भावना के लिए मरणोपरान्त “शौर्य चक्र” से सम्मानित किया गया।
सैपर शहजाद खान का जन्म 02 जुलाई 1965 को मुजफ्फर नगर के हबीबपुर सीकरी के एक साधारण परिवार में श्रीमती मुबशरा बेगम तथा श्री मुस्तफा खान के यहां हुआ था। इन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राइमरी पाठशाला, हबीबपुर सीकरी, जूनियर की शिक्षा जूनियर हाईस्कूल, हबीबपुर सीकरी तथा इन्टर की पढ़ाई भारत सेवक समाज इण्टर कालेज, लुहसाना से पूरी की। यह भारतीय सेना की इंजीनियर्स कोर में भर्ती हुए। बाद में इनकी अस्थायी तैनाती 111 सीमा सड़क संगठन में हुई।
सैपर शहजाद खान की याद में उनके गांव में स्थित विद्यालय में एक छोटा सा बोर्ड लगाया गया है। उनके भाई का कहना है कि उन्होंने अपने भाई की वीरता और बलिदान को अमर बनाने के लिए अपने स्तर पर काफी प्रयास किया, प्रधान और अन्य जनप्रतिनिधियों से संपर्क किया लेकिन अभी तक कोई काम नहीं हुआ है | उनका कहना है कि यदि उनके गांव की सड़क का नामकरण सैपर शहजाद खान, शौर्य चक्र के नाम पर कर दिया जाए और उस पर एक शौर्य द्वार बनवा दिया जाए तो यह उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी | इससे गांव, समाज और खासकर गांव के युवाओं में सेना में शामिल होने के लिए उत्साह बढ़ेगा।|
आपको बताते चलें कि शौर्य चक्र शांतिकाल का अशोक चक्र श्रृंखला का तीसरा सबसे बड़ा सम्मान है। यह असाधारण साहस, कर्तव्यपरायणता और वीरता का प्रदर्शन करने वाले लोगों को दिया जाता है।
– हरी राम यादव



