सांप का श्राप

सांप का श्राप
S4 न्यूज़ नेटवर्क संवाददाता

गर्मियों का मौसम था , उमस खूब हो रही थी । मैं जल्दी जाने के चक्कर में सड़क को छोड़कर पगडंडी से होकर जा रहा था। सहसा मेरा ध्यान पगडंडी की दाहिनी ओर छोटी छोटी कटी हुई झाड़ियों की ओर गया । मैंने देखा एक सांप अपने परिवार के साथ कटी हुई झाड़ियों के पास बैठा कुछ बातें कर रहा था। मैं वहीं रूककर उनकी बातें सुनने लगा। सांप काफी बुजुर्ग तथा अनुभवी लग रहा था। वह अपने बच्चों से कह रहा था कि अब मनुष्यों से डरने की कोई जरूरत नहीं है। वे अब पहले जैसा नहीं रहे। हमारे जवानी के दिनों में इन्सान इतना बलवान और निडर होता था कि फर्लांग भर खदेड़कर हमें पूंछ से ऐसे पकड़ लेता था जैसे की कोई मूली हो।
अब तो इंसान के बच्चों के पास वह ताकत कहाँ है। वे कीटनाशकों से सनी हुई सब्जियॉं लेकर आते हैं जिसे खाकर वह बीमार और कमजोर हो रहे हैं। तुम्हें खदेड़कर पूँछ से पकड़ने और मारने की ताकत उनमें अब कहाँ है। चार कदम दौड़ने पर उनकी सांसें मेले में बिकने वाले गुब्बारे की तरह फूल जाती हैं। उनके मुँह से लोहार की धौंकनी की तरह आवाज निकलने लगती हैं। उनके पास तो अब लाठी ड़ंड़ा भी नहीं है। जंगल तो वे खुद काट चुके हैं। लाठी ड़ंड़ा कहॉं से लायेंगे। वे तो अब खुद बेचारे हैं। उनके पास तो केवल अब हथियार के रूप में केवल राजनीतिक दलों का झंडा है। वह हड़ताल, धरना, प्रदर्शन भी नहीं कर सकते, उस पर भी देश और प्रदेशों की सरकारों ने रोक लगा दिया है ।
इन्सानों के बच्चों को अब दूध, दही, घी भी नहीं मिल रहा है। दूध देने वाली गाय और भैसें तो बीते जमाने की बात हो गयी हैं। उन बेचारियों की भी शामत आ गयी है। मांस के कारोबारी उन्हें काट काट कर दूसरे देशों में भेज कर मोटा माल कमा रहे हैं। जिन इक्के दुक्के लोगों ने पाल भी रखा है वह लोग एकदम भोर में दूध को बाजार में बेंच आते हैं। बच्चों को पता ही नहीं चलता कि दूध कहाँ गया। अब तो इंसानों की माताएं भी अपने बच्चों को दूध नहीं पिलातीं। अब तो इंसानों का यह डायलाग “मॉं का दूध पिया है तो सामने आओ, नहीं तो जाकर ऑचल में छुप जाओ” भी झूठा हो गया है। न तो उन बेचारों को माँ का दूध पीने को मिल रहा है और न ही अब ऑंचल में छुपने की जगह रही। उनकी माताओं ने साड़ी पहनना छोड़ दिया है। और तो और अब उनकी आधुनिक मम्मियॉं छठी का दूध भी नहीं पिलातीं, जिससे कि उन्हें कोई समस्या होने पर दूध की याद आये। बेचारों के बच्चे तो अब पाउडर से बना दूध पी रहे हैं। उस दूध को भी न जाने मुनाफाखोरों ने क्या क्या मिलाकर बनाया होगा। मॉं का दूध और ऑंचल दोनों भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति से दूर चले गये हैं।
जिस तरह से इंसानों ने जंगल तथा पेड़ पौधों को काटकर हमारे रहवास को छीना है। हमारी पुश्तैनी बिलों के ऊपर अपने लिए मकान बना रहे हैं । वह हमारी जाति को ललकार रहे हैं। हमारी श्रृंखला को नष्ट करने की कोशिश कर रहे है। वे प्रकृति की श्रृंखला को भूल चुके है। उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि सभी जीवधारी एक दूसरे के ऊपर निर्भर है। यदि हम नहीं रहे तो खतरा मनुष्यों के ऊपर भी बढ़ेगा। हमारी बिरादरी फसलों तथा इंसानों को नुकसान पहुँचाने वाले कीट पतंगों को खाकर अपना जीवन निर्वाह करती है, जिससे उनकी फसलों की सुरक्षा होती है । हम हर हाल में उनसे मित्रता रखना चाहते हैं। लेकिन इंसान इस बात को समझ नहीं रहा है। वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है।
उन्हें यह याद दिलाना पड़ेगा कि ईश्वर ने हमें ऐसी ऑंखें दी है जिससे हम किसी भी तस्वीर को उनमें कैद करके रख सकें लेकिन हम ऐसा कम ही करते हैं। हम ऐसा तभी करते हैं जब कोई हमारे परिवार को नुकसान पहॅुंचाता है। हमारे ही सामने हमारे परिवार के सदस्य को बेरहमी से पीट पीटकर मार देता है। इंसानों ! मैं आपसे पूंछता हूँ कि क्या आपके परिवार को कोई नुकसान पहुँचाता है तो उसे आप माफ कर देते हो ? आप को तो विधाता ने बुध्दि दी है। हम सांपों को तो उससे दूर रखा है।
हम तो एक दोस्त के नाते इंसानों को देखते ही उनसे दूर रहने की कोशिश करते हैं कि कहीं वे हमसे डर न जाएं। हमारे साथ तो प्रकृति ने भी क्रूर मजाक किया है उसने हमें कान नहीं दिए हैं । हम तो केवल धरती के स्पर्श से अनुभव करके अपना काम चला रहे हैं लेकिन इंसान को तो प्रकृति ने ऑंख़, नाक , कान सब कुछ दिया है। तब भी वह अन्धे की तरह हमारे ऊपर पैर रख देता है। बहरे की तरह उसको हमारी आवाज सुनाई नहीं देती है, जबकि आहट पाते ही हम लोग आवाज करते हैं । यदि हम अपने बचाव में मनुष्य को काट लेते हैं तो इसमें हमारी क्या गलती है? गलती तो इंसान की है न , कि उसके पास आंख, नाक, कान सब कुछ होते हुए भी हमारे ऊपर पैर रख रहा है।
मैं उन्हे यह श्राप देता हूँ कि जिस तरह से उनसे उनकी मॉं का ऑंचल छिन गया, जिस तरह से उनसे उनकी माँ का दूध छिन गया और जिस तरह से पेड़ पौधों के अभाव में उनसे उनकी सांसे छिन रही हैं। वैसे ही उनसे उनका हर आश्रय छिन जाए। उनको आश्रय देने वाले उनके बच्चों को नौकरी मिल जाए और वे दूसरों के नौकर होकर उनसे दूर चले जाएं। उनके बच्चों को दूसरे का मकान किराए पर लेकर रहना पड़े जिससे उन्हें यह एहसास हो कि अपना घर छूटने का दर्द क्या होता है। बुड्ढे इंसानों को आश्रयहीन होकर बृध्दाश्रम में रहना पड़े। मैं उन्हे कवि घाघ की वे पंक्तियाँ याद दिलाता हॅू जिनमें इसी तथ्य को ध्यान में रखकर उन्होंने नौकरी को सबसे खराब बताया था – उत्तम खेती, मध्यम बान। निषिध चाकरी, भीख निदान।
मेरे बच्चों, इंसान इतनी आसानी से समझने वाला नहीं है। मैं उन्हें गोस्वामी तुलसीदास की लिखी हुई रामचरित मानस की उस चौपाई को याद दिलाना चाहता हूँ जिसमें उन्होंने पराधीनता को सबसे बड़ा दुख कहा है – “पराधीन सपनेहु सुख नाहीं”। उनको तब पता चलेगा कि अपना रहवास छिनने का दर्द क्या होता है। जब उनके घर में कोई रहने वाला नहीं होगा। तब मेरे बच्चों ! उनके बनाए घरों पर तुम्हारा कब्जा होगा। तुम लोग उनके महगे पलंग, मुलायम बिस्तर तथा बड़े बड़े सोफों के स्वामी होंगे। उन घरों में खूब उछलना कूदना, हर जगह घूमना फिरना। यह इंसानों को मेरा श्राप तथा बच्चों तुम्हें मेरा आर्शीवाद है।
बुर्जुग सांप की बातें सुनकर मेरी ऑंखें खुली की खुली रह गयीं और मैं यह सोचने पर विवश हो गया कि वह बूढ़ा सांप तो ठीक ही कह रहा है। हम उनका रहवास छीन रहे हैं। आखिर वे बेचारे कहाँ जाएं। हमारे बच्चों को नौकरी मिलने पर हम बेइंतहा खुश होते हैं। आखिर हम यह क्यों नही सोचते कि हमारा बच्चा हमसे दूर जा रहा है। इसकी कीमत दोनों को तड़पकर चुकानी पड़ेगी। हमसे भला और समझदार तो वह सांप है जो कि एक बुध्दिहीन जीव है। हम तो उस बेचारे को सांप कहते है जबकि मनुष्य तो उससे ज्यादा जहरीला सांप है। दूसरे के प्रति अपने मन में ईर्ष्या का जहर लिए घूमता रहता है। मौका मिलते ही बदला चुका लेता है। कम से कम सांप तो ऐसा नहीं करते हैं । हम पेड़ पौंधों को काटकर अपनी ही सांसों को कम कर रहे हैं। आइए हम सब मिलकर सांप द्वारा दी गयी सीख पर अमल करें तथा पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव को उसका अधिकार दें। एक बुध्दिजीवी प्राणी होने के कारण यह हमारा नैतिक दायित्व भी है।
– हरी राम यादव
लेखक
बनघुसरा, अयोध्या
7087815074




