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बैठने के लिए ठेके बन गये ठांव है
*बैठने के लिए ठेके बन गये ठांव है*
शराब के शबाब में डूब रहे गांव हैं,
बैठने के लिए ठेके बन गये ठांव है।
जिसे देखो शाम को वहीं चला आ रहा,
हाथ में पाउच और नमकीन है गहा।
पी पीकर लोग इधर-उधर गिर रहे,
बताओ सरकार उन्हें मनुष्य कौन कहे।
उन्हें न चिंता स्वयं की न घर बार की,
न चिंता माता-पिता पत्नी परिवार की ।
क्या समाज को डुबोकर सडे़ आब में,
चार चांद लगाएंगे अपने रुआब में।
अगर शराबी बनाना देश का विकास है,
तो फिर बताइए हरी क्या विनाश है।
चूल्हे को ठंडा कर रही शराब की थैली,
इसके प्रदेश की छवि हो रही मटमैली।
हर अपराध की जड़ में बसी शराब है,
‘पी लिया था’ अपराधी का जबाब है।।
– हरी राम यादव



