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शहीदी दिवस : 19 दिसंबर

शहीदी दिवस : 19 दिसंबर
आज़ादी के इन दीवाने : अशफाक उल्लाह खाँ
     देश गुलामी में कराह रहा था, अंग्रेजों का अत्याचार दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था | देश को आजाद कराने के लिए संघर्ष तेज हो चुका था | लोग अपनी अपनी तरह से प्रयास कर रहे थे | देश की ज्यादातर जनता गाँधी जी की अनुगामी थी  | लेकिन देश के नवयुवकों का एक दल जो कि गोरखपुर के चौरी चौरा घटना के बाद गाँधी जी द्वारा असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने की विचारधारा से आक्रोशित था | उनका विचार था कि आज़ादी मांगने से नहीं आएगी, इसको बलात छीनना पड़ेगा| आजादी के इस विचारधारा के लोगों में प्रमुख नाम सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्लाह खाँ  के हैं|
आज़ादी के इन दीवानों को अंग्रेजों से लड़ने के लिए हथियारों की आवश्यकता थी और हथियार खरीदने के लिए पैसों की इन लोगों ने मिलकर 08 अगस्त को तय किया कि पैसों की कमी को दूर करने के लिए  रेलगाड़ी से जो सरकारी खजाना लखनऊ से जाता है उसे लूटा जाए | तय हुआ कि सभी लोग शाहजहाँपुर से रेलगाड़ी में  चढ़ेंगे और काकोरी के पास पहले से तय स्थान तक जाएंगे, वहाँ पर गाड़ी की चेन खींची जाएगी और गार्ड के केबिन में पहुंच कर रुपयों से भरे संदूक पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा | सभी बिन्दुओं पर विचार करते हुए यह निश्चय किया गया कि हम लोग किसी को शारीरिक नुक़सान नहीं पहुंचाएंगे | रेलगाड़ी में ही ऐलान कर दिया जायेगा  कि हम यहाँ अवैध तरीक़े से हासिल किए गए सरकारी धन को हासिल करने आए हैं| यह भी निश्चय किया गया कि हममें से तीन लोग हथियार के साथ गार्ड के केबिन के पास खड़े होंगे और रुक-रुक कर फ़ायर करेंगे ताकि कोई केबिन तक पहुंचने की हिम्मत न कर सके |
     योजना के अनुसार  09 अगस्त 1925 के दिन , जगह लखनऊ का काकोरी,  सहारनपुर से चलने वाली 8 डाउन पैसेंजर में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, शचीन्द्रनाथ बख्शी, चन्द्रशेखर आज़ाद, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुरारी शर्मा, मुकुन्‍दी लाल और मन्मथनाथ गुप्ता सवार हुए |  योजना के अनुसार अशफाक उल्लाह खाँ , राजेंद्र लाहिड़ी और सचींद्र नाथ बख्शी सेकंड क्लास में और बाकी सब थर्ड क्लास में बैठ गए | ट्रेन जैसे ही काकोरी पहुंची तय योजना के अनुसार शचीन्द्रनाथ बख्शी ने गाड़ी की  चेन खींच दी और गार्ड के डिब्बे में रखे सरकारी खजाने को क्रांतिकारियों ने लूट लिया |  रुपयों से भरा लोहे का संदूक़ काफ़ी भारी था, वह लोग उसे लेकर भाग नहीं सकते थे इसीलिए अशफ़ाक़ उल्लाह खाँ  उसे  हथौड़े से तोड़ने लगे |  लोगों को डराने के मकसद से क्रन्तिकारी रह रहकर  हवा में गोलियां चला रहे थे |
     गार्ड के डिब्बे से दो डिब्बे पहले ट्रेन का एक यात्री अपने डिब्बे से नीचे उतरा और गार्ड के केबिन की तरफ़ बढ़ने लगा | क्रांतिकारियों को संदेह हुआ कि यह आदमी हमारे काम में खलल डालने आ रहा है | मन्मथनाथ गुप्ता ने उसके ऊपर गोली चला दी और वह आदमी मौके पर ही मारा गया |  जगह छोड़ने से पहले सभी लोगों ने यह यकीन  किया कि कहीं कोई चीज़ छूट तो नहीं रही है | वह लोग वहाँ से तुरन्त भाग गये |  भागते समय जल्द बाजी मे रेलवे लाइन के पास एक चादर छूट गयी, उस चादर पर शाहजहाँपुर के एक धोबी का निशान था | यहीँ से पुलिस को अंदाज़ा हुआ कि कहीं-न-कहीं इस लूट का संबंध शाहजहाँपुर से है |  पुलिस ने शाहजहाँपुर में उस धोबी को ढूंढ निकाला | यहीं से काकोरी की इस घटना का खुलासा हो गया |
     काकोरी कांड के तीन महीने के अंदर एक एक करके इसमें शामिल सभी क्रांतिकारियों की गिरफ़्तारी शुरू हो गई | अशफ़ाक़ उल्लाह खां , ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, बनारसी लाल और कई अन्य क्रांतिकारी गिरफ़्तार कर लिए गए | अंग्रेज पुलिस सबसे बाद में राम प्रसाद बिस्मिल को गिरफ़्तार कर पायी | हर संभव कोशिश करने के बाद भी ब्रितानी पुलिस आज़ाद का पता नहीं लगा सकी | गिरफ्तार किए गए क्रांतिकारियों के  खिलाफ राजद्रोह करने, सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने और मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया गया। 06 अप्रैल 1927 को अदालत ने अपना मनमानी फैसला सुनाया – ठाकुर रोशन सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्लाह ख़ाँ और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को फांसी की सजा सुनाई गई तथा अन्य कई क्रांतिकारियों को 04 से लेकर 14 साल तक की सजा सुनाई गयी | इस कांड में शामिल  02 लोग सरकारी गवाह बन गए |   19 दिसंबर 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर , ठाकुर रोशन सिंह को मलाका और अशफाक उल्लाह खाँ को फ़ैज़ाबाद जेल  में फाँसी दे दी गई |  राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर को गोंडा जेल में फाँसी पर चढ़ा दिया गया |
     अशफाक उल्लाह खाँ का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को  संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश भारत (अब उत्तर प्रदेश) के शाहजहाँपुर के  शहीदगढ़ में मजहरुन्निशाँ और शफीकुर रहमान के यहाँ हुआ था | यह अपने  छह भाई बहनों में सबसे छोटे थे। अशफाक उल्ला खाँ के पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे। अशफाक उल्ला खाँ एक बेहतरीन लेखक और कवि भी थे | वह  ‘हसरत’ उपनाम से उर्दू कविता लिखते थे। उन्होंने कभी भी अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं की। उनका कहना था कि “हमें नाम पैदा करना तो है नहीं। अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता?” उनकी लिखी हुई कविताएँ अदालत आते-जाते समय अक्सर ‘काकोरी कांड’ के क्रांतिकारी गाया करते थे।
     लखनऊ सेंट्रल जेल में मुकदमें के समय शचींद्र नाथ बख्शी और अशफाक उल्लाह खाँ एक साथ बंद थे और फैसला होने की तारीख तक वह दोनों साथ ही रहे | फैसला सुनाए जाने के बाद अदालत से दोनों जेल लाए गए। शाम को लखनऊ स्टेशन तक दोनों साथ रहे। फिर अशफाक उल्लाह खाँ को  फैजाबाद जेल और शचींद्र नाथ बख्शी को आगरा सेंट्रल जेल भेज दिया गया। अशफाक उल्लाह खाँ देश की आज़ादी के लिए मर मिटने वाले एक बहादुर यौद्धा थे, वह हर हाल में देश को आजाद देखना चाहते थे |  उनकी इस  इच्छा को व्यक्त करती उनकी कविता –
“जाऊँगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा,
जाने किस दिन हिन्दुस्तान आजाद वतन कहलायेगा ?
बिस्मिल्ला हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊँगा, फिर आऊँगा,
फिर आकर के ऐ भारत माँ तुझको आजाद कराऊँगा”,
जी करता है में भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ,
हाँ खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगा,
और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा ”
      – हरी राम यादव
      अयोध्या
      7087815074

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